महाराणा संग्राम सिंह, जिन्हें इतिहास महाराणा सांगा के नाम से जानता है, केवल मेवाड़ के राजा नहीं थे, बल्कि वे 16वीं शताब्दी के भारत के सबसे शक्तिशाली हिंदू सम्राट और अदम्य साहस के प्रतीक थे।
महाराणा सांगा : मेवाड़ का गौरव और सांगा का उदय
मेवाड़ की भूमि हमेशा से बलिदानों की भूमि रही है, लेकिन महाराणा सांगा ने इसे भारतीय राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया। 1508 में जब वे सिंहासन पर बैठे, तब उत्तर भारत में दिल्ली की सल्तनत बिखर रही थी। सांगा के दादा, महाराणा कुम्भा ने मेवाड़ को जो मजबूती दी थी, सांगा ने उसे विस्तार दिया। उनके शासनकाल में मेवाड़ की सीमाएं इतनी विस्तृत हुईं कि उन्हें “हिंदूपत” की उपाधि मिली। वे एक ऐसे योद्धा थे जिनका पूरा जीवन युद्ध के मैदान में बीता। उनके बारे में कहा जाता है कि उनके शरीर पर एक भी अंग ऐसा नहीं था जहाँ घाव न हो, फिर भी उनकी तलवार कभी कमजोर नहीं पड़ी।
सैनिकों का भग्नावशेष”: अद्भुत शारीरिक शौर्य
इतिहासकार जेम्स टॉड ने राणा सांगा को ‘सैनिकों का भग्नावशेष’ (Fragment of a Soldier) कहा है। यह कोई अपमान नहीं, बल्कि उनके अकल्पनीय साहस का सम्मान था।
- युद्ध के घाव: उनके शरीर पर तलवारों और भालों के 80 से अधिक निशान थे।
- अंगों का बलिदान: जीवन के अलग-अलग युद्धों में उन्होंने अपनी एक आँख गँवा दी, एक युद्ध में उनका एक हाथ कट गया और एक अन्य युद्ध में पैर में तीर लगने के कारण वे एक पैर से भी अक्षम हो गए।
- संकल्प: सामान्य मनुष्य एक उंगली कटने पर भी बैठ जाता है, लेकिन सांगा एक हाथ, एक पैर और एक आँख के बिना भी घोड़े पर चढ़कर सेना का नेतृत्व करते थे। उनके लिए युद्ध ‘पूजा’ और ‘तपस्या’ के समान था।
वामपंथी इतिहास और “बाबर के निमंत्रण” का मिथक
भारतीय इतिहास के कुछ आधुनिक ग्रंथों में, विशेषकर वामपंथी विचारधारा से प्रभावित लेखों में, यह आरोप लगाया गया कि सांगा ने इब्राहिम लोदी को हराने के लिए बाबर को आमंत्रित किया था। यह दावा पूरी तरह आधारहीन है और इसके पीछे सांगा की छवि धूमिल करने की साजिश दिखती है।
- इब्राहिम लोदी पर विजय: सांगा बाबर के आने से बहुत पहले ही खातोली (1517) और बाड़ी (1518) के युद्धों में इब्राहिम लोदी को दो बार बुरी तरह पराजित कर चुके थे। उन्हें किसी विदेशी की मदद की आवश्यकता नहीं थी।
- वास्तविक स्थिति: बाबर को इब्राहिम लोदी के सगे संबंधी दौतत खां लोदी और आलम खां लोदी ने आमंत्रित किया था। सांगा ने बाबर से सहयोग का केवल दिखावा इसलिए किया होगा ताकि विदेशी आक्रांता और दिल्ली का सुल्तान आपस में लड़कर कमजोर हो जाएं, लेकिन जब उन्होंने देखा कि बाबर खुद दिल्ली पर कब्जा करना चाहता है, तो सांगा ने उसके खिलाफ युद्ध का बिगुल फूंक दिया।
महान सैन्य विजयें: अपराजेय सांगा
महाराणा सांगा की सैन्य शक्ति का लोहा पूरा उत्तर भारत मानता था। उनके प्रमुख सैन्य अभियान निम्नलिखित हैं:
क. मालवा का सुल्तान और ‘उदारता’ की मिसाल
1519 में मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी द्वितीय ने मेवाड़ के प्रभाव को चुनौती दी। गागरोन के युद्ध में सांगा ने न केवल सुल्तान को हराया, बल्कि उसे घायल अवस्था में बंदी बनाकर चित्तौड़ ले आए।
- तीन महीने की कैद: सांगा ने सुल्तान को तीन महीने तक अपनी कैद में रखा।
- राजपूती बड़प्पन: बाद में उन्होंने सुल्तान को उसका राज्य वापस लौटा दिया और बदले में केवल एक रत्नजड़ित कमरबंद और कुछ अन्य निशानियां लीं। यह उनकी राजनीतिक उदारता का प्रतीक था।
- जजिया की समाप्ति: इसी विजय के बाद सांगा ने मालवा क्षेत्र से हिंदुओं पर लगने वाले ‘जजिया कर’ को समाप्त करवा दिया।
ख. गुजरात के सुल्तानों का दमन
गुजरात के मुजफ्फर शाह ने भी कई बार मेवाड़ के खिलाफ गठबंधन बनाने की कोशिश की, लेकिन सांगा की सेना ने उसे हर बार धूल चटाई। सांगा ने इडर, अहमदनगर और विसनगर जैसे किलों पर अधिकार कर अपनी धाक जमाई।
सांगा का विशाल साम्राज्य और गठबंधन
महाराणा सांगा ने सदियों बाद भारत में “राजपूत संघ” की स्थापना की। उनके नेतृत्व में मारवाड़, आमेर, ग्वालियर, अजमेर, चंदेरी और बूंदी के राजा एक झंडे के नीचे आए।
- सेना की विशालता: कर्नल टॉड के अनुसार, सांगा की सेना में 80 हजार घुड़सवार, 7 उच्च श्रेणी के राजा, 9 राव और 104 बड़े सरदार शामिल थे। उनके पास 500 युद्धक हाथी थे।
- साम्राज्य का विस्तार: उत्तर में सतलज नदी से लेकर दक्षिण में नर्मदा तक और पश्चिम में सिंधु से पूर्व में बयाना (आगरा के पास) तक उनका प्रभाव था। उस समय भारत में उनके बराबर शक्तिशाली केवल दक्षिण का विजयनगर साम्राज्य (कृष्णदेव राय) था।
बयाना का युद्ध: बाबर की सेना में खौफ
1527 की शुरुआत में, खानवा से पहले बयाना का युद्ध हुआ। सांगा ने बाबर के गवर्नर को पराजित किया। इस युद्ध में राजपूतों के शौर्य को देखकर बाबर की सेना इतनी डर गई कि मुग़ल सैनिक वापस भागने की बात करने लगे। काबुल से आए एक ज्योतिषी ने भी भविष्यवाणी कर दी कि बाबर की हार निश्चित है।
खानवा का युद्ध (1527): इतिहास की एक त्रासद घटना
यह युद्ध 16 मार्च 1527 को हुआ। यह केवल दो राजाओं का युद्ध नहीं था, बल्कि भारत के भविष्य का फैसला था।
- बाबर की कूटनीति: अपनी सेना को भागते देख बाबर ने शराब के प्याले तोड़ दिए और युद्ध को ‘जिहाद’ का नाम दिया। उसने मुसलमानों पर लगने वाला ‘तमगा’ कर हटा दिया ताकि सैनिक धर्म के नाम पर लड़ें।
- तोपखाना बनाम वीरता: राजपूतों के पास तलवारें और हाथी थे, जबकि बाबर के पास आधुनिक तोपखाना और ‘तुलुगमा’ युद्ध पद्धति थी। तोपों के गोले हाथियों को डरा देते थे, जिससे सांगा की अपनी ही सेना में भगदड़ मच गई।
- सांगा का घायल होना: युद्ध के दौरान एक तीर महाराणा सांगा के सिर में लगा और वे बेहोश हो गए। उन्हें रणभूमि से सुरक्षित बाहर ले जाया गया, लेकिन नेतृत्व के अभाव में राजपूत सेना बिखर गई।
बलिदान और अंतिम समय
जब सांगा को होश आया और उन्हें अपनी हार का पता चला, तो वे क्रोध और शोक से भर गए।
- प्रतिज्ञा: उन्होंने प्रतिज्ञा की कि जब तक वे बाबर को पराजित कर भारत से बाहर नहीं निकाल देंगे, वे चित्तौड़ की भूमि पर कदम नहीं रखेंगे और न ही सिर पर मुकुट पहनेंगे। उन्होंने ‘बसवा’ के जंगलों में रहना शुरू किया।
- अंतिम धोखा: सांगा फिर से सेना संगठित कर बाबर पर आक्रमण के लिए चंदेरी की ओर बढ़े। लेकिन उनके ही कुछ सामंत, जो अब और अधिक युद्ध नहीं चाहते थे और मुगलों की ताकत से डर गए थे, उन्होंने सांगा के खाने में विष (जहर) मिला दिया।
- मृत्यु: 30 जनवरी 1528 को कालपी (उत्तर प्रदेश) में इस महान सम्राट का देहांत हो गया। उनका अंतिम संस्कार माण्डलगढ़ (भीलवाड़ा) में किया गया।
सांगा की विरासत: भारत क्यों नहीं हारा?
इतिहास केवल जीत और हार का नाम नहीं है। सांगा खानवा का युद्ध हार गए, लेकिन उन्होंने जो ‘प्रतिरोध की भावना‘ पैदा की, वह कभी नहीं हारी।
- सांस्कृतिक प्रभाव: सांगा ने सिखाया कि शरीर चाहे कितना भी जर्जर हो जाए, राष्ट्र के प्रति निष्ठा नहीं डगमगानी चाहिए।
- भविष्य के नायक: सांगा के ही वंश में आगे चलकर महाराणा प्रताप पैदा हुए, जिन्होंने अकबर के खिलाफ उसी संघर्ष को जारी रखा।
- हिंदू गौरव: सांगा ने बिखरते हुए हिंदू समाज को एक राजनीतिक चेतना दी, जो आगे चलकर छत्रपति शिवाजी महाराज और बाजीराव पेशवा के समय पूर्ण हिंदू पद-पादशाही के रूप में उभरी।
निष्कर्ष: शौर्य की अमर गाथा
महाराणा सांगा का व्यक्तित्व हिमालय जैसा ऊँचा था। वे एक ऐसे योद्धा थे जिनके लिए “वीरगति” पराजय से कहीं अधिक गौरवमयी थी। यदि खानवा के युद्ध में उनके पास आधुनिक शस्त्र होते या उनके सामंतों ने उन्हें जहर न दिया होता, तो भारत का इतिहास आज कुछ और ही होता।
आज जब हम भारत के गौरवशाली इतिहास की बात करते हैं, तो सांगा के 80 घाव हमें याद दिलाते हैं कि यह स्वतंत्रता और यह संस्कृति कितनी बड़ी कीमत चुकाकर बचाई गई है। वे केवल मेवाड़ के नहीं, बल्कि पूरे भारतवर्ष के महानायक हैं।
